Gita Explained
कृष्ण कहते हैं8.6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

yaṃ yaṃ vāpi smaran bhāvaṃ tyajatyante kalevaramtaṃ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ

शब्दार्थ
yam yam — whatevervā — orapi — evensmaran — rememberingbhāvam — remembrancetyajati — gives upante — in the endkalevaram — the bodytam — to thattam — to thateva — certainlyeti — getskaunteya — Arjun, the son of Kuntisadā — alwaystat — thatbhāva-bhāvitaḥ — absorbed in contemplation

श्लोक कहता है

अन्त में शरीर छोड़ते हुए मनुष्य जिस भाव को स्मरण करता है, वही उसे प्राप्त होता है। क्योंकि वह सदा उसी भाव से गढ़ा जाता रहा है।

सरल शब्दों में

पंक्ति का दूसरा आधा पूरे प्रसंग की चाबी है।

सदा तद्भावभावितः — सदा उसी से गढ़ा हुआ। आख़िरी विचार कहीं से अचानक नहीं आता।

वह वही है जो सबसे गहरा घिसा हुआ है, और जब उसे रोकने वाला कुछ नहीं बचता तब ऊपर आ जाता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

एक कुत्ता सड़क पर आ जाता है। अगले आधे सेकंड में चालक के हाथ जो करते हैं, वह उस आधे सेकंड में तय नहीं हुआ था। वह दस साल की ड्राइविंग में तय हुआ था, हज़ार छोटे पलों में जो किसी को याद नहीं, उसे भी नहीं। ऐसे दबाव में कोई मौक़े पर उठकर नहीं दिखाता। आप उसी पर गिरते हैं जिसे आपने अपने आप चलने लायक़ बना लिया है।

और गहराई में

आख़िरी पल का कुछ भी आख़िरी पल में नहीं सँवारा जा सकता, और श्लोक यह सीधे कहता है।

यह दो तरफ़ काटता है और दोनों काम के हैं। इससे शॉर्टकट की गुंजाइश ख़त्म होती है — आप इसकी रटाई नहीं कर सकते, और अच्छा अन्त ख़रीद लेने की परम्परा को इस पंक्ति से कोई सहारा नहीं मिलता। इससे दहशत भी हटती है, क्योंकि आपका आख़िरी विचार आपके पूरे जीवन पर उछाला गया सिक्का नहीं है।

गढ़े जाने वाला शब्द ही पकड़ने लायक़ है। अन्त में मन कोरा काग़ज़ नहीं होता। वह एक घिसी हुई पगडंडी होता है, और दबाव में वह वही करता है जो वह बरसों से चुपचाप करता आया है।

तो काम का सवाल यह नहीं कि अन्त में आप क्या सोचेंगे। सवाल यह है कि एक साधारण बुधवार को आप क्या सोचते हैं, क्योंकि दोनों एक ही सवाल हैं, बस अलग आवाज़ में पूछे गए।