Gita Explained
कृष्ण कहते हैं14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥

guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavānjanma-mṛtyu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛtam aśnute

शब्दार्थ
guṇān — the three modes of material natureetān — theseatītya — transcendingtrīn — threedehī — the embodieddeha — bodysamudbhavān — produced ofjanma — birthmṛtyu — deathjarā — old ageduḥkhaiḥ — miseryvimuktaḥ — freed fromamṛtam — immortalityaśnute — attains

श्लोक कहता है

देह के साथ उठने वाले इन तीनों गुणों से पार जाकर, देह वाला जन्म, बुढ़ापे और दुख से छूट जाता है। और वह उसे पा लेता है जो मरता नहीं।

सरल शब्दों में

देह-समुद्भवान् — देह के साथ ही उठने वाले।

गुण साथ ही आते हैं। वे किसी की कमाई हुई ख़राबी नहीं हैं।

और जिस स्वतन्त्रता का वर्णन है वह उनके होने से नहीं है। वह उनके नीचे होने से है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

किसी स्थायी रोग के साथ जी रहा आदमी लगभग चार साल में बुरे दिन और बुरे जीवन का फ़र्क़ करना सीख जाता है। रोग में कुछ नहीं बदला। बदला यह कि एक बुरे मंगलवार का अगले बीस साल के बारे में कुछ भी मतलब निकलना बन्द हो गया।

और गहराई में

गुणों से पार जाने का मतलब उनका न रह जाना नहीं है, और इस श्लोक का देह वाला शब्द उसका सबूत है।

वे देह के साथ उठते हैं। जब तक देह है तब तक स्वच्छता, वेग और भारीपन रहेंगे, अपनी-अपनी बारी लेते हुए। न इस अध्याय में न कहीं और यह संकेत है कि किसी सिद्ध आदमी के सपाट शुक्रवार आने बन्द हो जाते हैं।

जो बदलता है वह रिश्ता है, और अर्जुन का अगला सवाल उसी के बारे में पूछने का ठीक सवाल है।

वह पूछने वाला है कि ऐसा आदमी दिखता कैसा है, और श्लोक २२ से २५ का उत्तर ऐसे आदमी का वर्णन करता है जो तीनों को अब भी भोगता है और उनके आने-जाने से हिलता नहीं। गुण चलते रहते हैं। जो बन्द होता है वह उनसे उठाए और गिराए जाते रहने का काम है, और किसी को भी ख़बर मान लेने का।