Gita Explained
कृष्ण कहते हैं7.14

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥

daivī hyeṣā guṇa-mayī mama māyā duratyayāmām eva ye prapadyante māyām etāṃ taranti te

शब्दार्थ
daivī — divinehi — certainlyeṣā — thisguṇa-mayī — consisting of the three modes of naturemama — mymāyā — one of God’s energies. It that veils God’s true nature from souls who have not yet attained the eligibility for God-realizationduratyayā — very difficult to overcomemām — unto meeva — certainlyye — whoprapadyante — surrendermāyām etām — this Mayataranti — cross overte — they

श्लोक कहता है

तीन अवस्थाओं की बनी हुई यह मेरी दिव्य माया पार करना बहुत कठिन है। जो मेरे पास आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।

सरल शब्दों में

माया का अर्थ यह नहीं कि वहाँ कुछ है ही नहीं।

वह वह रूप है जो संसार ओढ़ लेता है — काफ़ी असली, बस पूरी कहानी नहीं।

और कृष्ण यह नहीं जताते कि इसे भेदना आसान है। वे इसे दुरत्यया कहते हैं, बहुत कठिन। फिर वे वही एक रास्ता बताते हैं जो चलता है।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

रात के डेढ़ बजे हैं और आपको छह बजे उठना है। आप दो घंटे से सोने की कोशिश कर रहे हैं, और वही कोशिश आपको जगाए हुए है। यह समस्या आज तक किसी ने ज़्यादा ज़ोर लगाकर हल नहीं की। यह कोशिश छोड़ देने से हल होती है, और वह छोड़ना कोई और, ज़्यादा चतुर क़िस्म की कोशिश नहीं है।

और गहराई में

यहाँ जो रास्ता दिया गया है वह वही एक चीज़ है जिस तक मेहनत से नहीं पहुँचा जा सकता था, और यह संयोग नहीं है।

तीन अवस्थाएँ जो कुछ भी पैदा करती हैं, वह ख़ुद उन्हीं अवस्थाओं का बना होता है — इनसे पार देखने की आपकी कोशिशें भी। वेग वाला आदमी समस्या पर वेग से टूटेगा। साफ़ दिमाग़ वाला उस पर साफ़ ढंग से सोचेगा। दोनों उसी चीज़ के भीतर से काम कर रहे हैं जिससे निकलना चाहते हैं, इसीलिए श्लोक इसे कठिन नहीं, पार करने में कठिन कहता है।

प्रपद्यन्ते निकलने का शब्द है। वे उनकी ओर आते हैं, ख़ुद को सौंप देते हैं। यह पहली बार है जब पुस्तक उस क़दम पर टिकती है जिस पर अगले दो अध्याय खड़े हैं।

पाठक के लिए यह जितना रहस्यमय लगता है उतना है नहीं। कुछ समस्याएँ तभी घुलती हैं जब आप उन पर काम करना बन्द करते हैं। इसे उन्हीं में से एक बताया जा रहा है, बस बड़े पैमाने पर।