Gita Explained
कृष्ण कहते हैं8.3

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥

akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo ’dhyātmam ucyatebhūta-bhāvodbhava-karo visargaḥ karma-sanjñitaḥ

शब्दार्थ
śrī-bhagavān uvāca — the Blessed Lord saidakṣaram — indestructiblebrahma — Brahmanparamam — the Supremesvabhāvaḥ — natureadhyātmam — one’s own selfucyate — is calledbhūta-bhāva-udbhava-karaḥ — Actions pertaining to the material personality of living beings, and its developmentvisargaḥ — creationkarma — fruitive activitiessanjñitaḥ — are called

श्लोक कहता है

श्रीकृष्ण ने कहा: अक्षर, सर्वोच्च, वही ब्रह्म है। हर व्यक्ति में उसका अपना होना आत्मा कहलाता है। और वह उत्सर्ग जो प्राणियों को अस्तित्व में लाता है, कर्म कहलाता है।

सरल शब्दों में

तीन उत्तर, कसकर बँधे हुए।

तीसरा चौंकाता है। कर्म यहाँ काम-धन्धा नहीं है, न कर्तव्य, न पिछले जन्म की सज़ा।

वह वह बहाव है जो जीवित चीज़ों को होने में लाता है — सृष्टि, छोटे अर्थ में भी और बड़े में भी।

आपने इसे कहाँ महसूस किया है

आपके चाचा घर के पीछे वाली गली में पौधों की क़तार लगा रहे हैं। वे इकहत्तर के हैं। वे उस छाया में नहीं बैठने वाले, और यह सबको पता है, उन्हें भी। वे इसलिए लगा रहे हैं कि उनके अपने पिता ने साठ साल पहले दूसरी गली में लगाए थे, और वही छाया है जिसमें वे बड़े हुए।

और गहराई में

कर्म की जो परिभाषा यहाँ दी गई है, उसका रोज़मर्रा के इस्तेमाल से लगभग कोई मेल नहीं है।

न इनाम, न सज़ा, न कोई बहीखाता। विसर्ग — एक भेजना, एक छोड़ना, किसी चीज़ को हाथ से जाने देना जिसका फिर अपना जीवन होता है। इस पुस्तक में कर्म वह यन्त्र है जिससे कोई भी चीज़ अस्तित्व में आती है और चलती रहती है।

इससे पिछले अध्यायों के हर निर्देश का ढाँचा बदल जाता है। जब कृष्ण कहते हैं कि फल पर टिके बिना काम करो, तो वे काम निपटाने की बात नहीं कर रहे। वे उस चीज़ में आपकी हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं जो प्राणियों को बनाती है।

पाठक के लिए इससे शब्द का बोझ उतर जाता है। आपका काम चुकाया जा रहा कोई खाता नहीं है। वह एक भेजना है, और उससे जो निकलेगा वह आपकी नज़र से आगे तक जाएगा — यही कारण है कि नतीजे को पकड़े रखना कभी चलने वाला नहीं था।